नई दिल्ली.फ्लोटिंग रेट पर कर्ज लेने वाले लोगों को घटी हुई ब्याज दरों का फायदा देने में बैंकों की मनमानी पर सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को आरबीआई से जवाब

नई दिल्ली.फ्लोटिंग रेट पर कर्ज लेने वाले लोगों को घटी हुई ब्याज दरों का फायदा देने में बैंकों की मनमानी पर सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को आरबीआई से जवाब मांगा। इस मुद्दे से जुड़ी याचिका निपटाते हुए कोर्ट ने रिजर्व बैंक से पूछा कि बैंकों की मनमानी रोकने के लिए दिए गए सुझावों पर उसने क्या फैसला लिया है। आरबीआई को छह सप्ताह में जवाब देना होगा।

याचिकाकर्ता मनी लाइफ फाउंडेशन के सुझावों को कोर्ट ने 12 अक्टूबर 2017 को आरबीआई के पास भेजकर फैसला लेने को कहा था। फाउंडेशन ने एक जनहित याचिका के जरिये चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली बेंच को बताया कि विभिन्न बैंक और नॉन बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनियां मिडिल और लोअर मिडिल क्लास को फ्लोटिंग रेट पर होम, एजुकेशन और व्हीकल लोन इत्यादि देती हैं। जब बैंकों की लागत बढ़ती है तो ये ब्याज की दरें तुरंत बढ़ा देते हैं। लेकिन, जब यह लागत घटती है तो छह-छह माह तक ब्याज दरें नहीं घटाई जातीं।

2011 में रेपो रेट 2.0% बढ़ा था

आरबीआई 2014 से अब तक रेपो रेट 2.0% घटा चुका है। इससे पहले उसने 2011 में सात बार में 2.0% तक रेपो रेट बढ़ाया था। तब बैंकों ने तत्काल ही ब्याज दरें 2.0% तक बढ़ा दी थीं। लेकिन, इसके बाद जब अारबीअाई ने रेपो रेट घटाना शुरू किया तो बैंकों ने ऐसा नहीं किया। उसके बाद चार साल में रेपो रेट 2.0% घटा, जबकि बैंकों ने बेस रेट में 1.05% कटौती की। यानी 0.95% दर घटने का फायदा लोन लेने वालों को नहीं मिला।

रेपो रेट में कटौती का पूरा फायदा लोगों को नहीं मिला

2015 में रेपो रेट 1.25% घटा, बैंकों ने बेस रेट 0.7% ही घटाया :2015 में आरबीआई ने रेपो रेट चार बार कम किया, लेकिन बैंकाें ने ग्राहकों को तीन बार ही राहत दी, वो भी आधी-अधूरी 0.70% की। जबकि, रेपो रेट 1.25% कम हुआ था। दूसरी खास बात ये भी कि रेपो रेट घटने के तुरंत बाद बैंकों ने बेस रेट नहीं घटाए। इसमें हर बार दो से चार महीने तक का समय लिया।

2016 में रेपो रेट 0.50% घटा, बैंकों ने ब्याज दरें नहीं घटाई :5 अप्रैल 2016 को रेपो रेट 0.25% और फिर 4 अक्टूबर को फिर 0.25% घटा। यानी आधा फीसदी। लेकिन, बैंकों ने एक बार भी बेस रेट नहीं कम किया।

2017 में रेपो रेट 0.25% घटा, बैंकों ने 0.50% बेस रेट घटाया :हालांकि, इस साल रेपो रेट दो बार में 0.50% बढ़ा, बैंकों ने तीन बार में ब्याज 0.50% तक बढ़ाया है।

लेकिन, जब रेपो रेट बढ़ा तो ब्याज दरें भी तत्काल बढ़ा दी गईं :2010 और 2011 में आरबीआई ने 11 बार रेपो रेट बढ़ाया। बैंकों ने भी तत्काल ही ब्याज दरें बढ़ाईं। इन दो वर्षों में रेपो रेट 3% तक बढ़ा। हालांकि, दबाव की वजह से बैंक 2.50% तक ब्याज बढ़ा पाए।

बैंकों की मनमानी रोकने के लिए 4 प्रमुख सुझाव

- जो बैंक फ्लोटिंग रेट वाले लोन पर प्रचलित दरों से ज्यादा ब्याज वसूलते हैं और घटी दरों का लाभ ग्राहकों को नहीं दे रहे, उनके लिए आरबीआई निर्देश जारी करे।
- अगर बैंक तय रेट से ज्यादा ब्याज ले रहे हैं तो यह रकम रिजर्व बैंक के पास आनी चाहिए। सेंट्रलाइज्ड योजना के जरिये यह राशि उन सभी कर्जदारों को वापस मिलनी चाहिए, जिन्होंने फ्लोटिंग रेट पर कर्ज लिया है, ताकि वह कम ब्याज दर के लाभ से वंचित न हों।
- आरबीआई सभी बैंकों को निर्देश दें कि जो ग्राहक कम दरों पर कर्ज के पात्र हैं, उनसे कम ब्याज दर पर जाने के लिए कन्वर्जन शुल्क न लिया जाए। इसकी वसूली तुरंत रोकी जाए।
- बैंक ब्याज दरों में बदलाव की सूचना ग्राहकों को तुरंत दें। ब्याज दर में बदलाव के एक दिन के अंदर कम से कम तीन माध्यमों टेलीफोन, एसएमएस और ईमेल के जरिये यह सूचना जरूर देनी चाहिए।

2015 में रघुराम राजन ने कहा कि बैंक रेपो रेट कम करने के बावजूद कर्ज नहीं घटा रहे। अरुण जेटली के बैंक प्रमुखों से मुलाकात भी बेअसर रही।



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सुप्रीम कोर्ट।