रुद्राक्ष भगवान शिव का एक अभिन्न अंग माना जाता है। शिवपुराण और श्रीमद्देवीभागवत में रुद्राक्ष की माला धारण करने के कई नियम बताए गए है। इन ग्रंथों में इस

रुद्राक्ष भगवान शिव का एक अभिन्न अंग माना जाता है। शिवपुराण और श्रीमद्देवीभागवत में रुद्राक्ष की माला धारण करने के कई नियम बताए गए है। इन ग्रंथों में इस बात का वर्णन मिलता है कि कितने रुद्राक्ष से बनी माला कौन-से अंग पर पहननी चाहिए ताकी भक्त की हर मनोकामना पूरी हो सकें। श्रीमद्देवीभागवत के अनुसार- रुद्राक्ष की माला का निर्माण एक से लेकर चौदहमुखी रुद्राक्षों से किया जाता है। अलग-अलग संख्या के दानों की माला शरीर के विभिन्न अंगों पर धारण की जाती है। 50 दानों की माला को ह्रदय पर और 20 दानों की माला को सिर पर धारण करना चाहिए। श्रीमद्देवीभागवत के अनुसार- रुद्राक्ष के 16 दानों की माला को भुजाओं पर, 12 दानों की माला को मणिबंध (पंजे और हाथ को जोड़ने वाला हिस्सा) पर और 108 दानों की माला को गले में धारण करने का महत्व होता है। श्रीमद्देवीभागवत के अनुसार- रुद्राक्ष की 108 दानों वाली माला धारण करने से हर पल अश्वमेध यज्ञ का फल मिलता है और ऐसा व्यक्ति शिवलोक की प्राप्ति करता है। सामान्य माला की जगह 108 दानों वाली रुद्राक्ष की माला का जप करने से 10 गुणा पुण्य मिलता है। शिवपुराण के अनुसार- संसार में रुद्राक्ष के समान फल और लाभ देने वाली कोई और माला नहीं है। इसलिए मनोकामना पूर्ति के लिए इसे धारण करना चाहिए, इसकी पूजा करनी चाहिए और इससे जाप करना चाहिए। श्रीमद्देवीभागवत के अनुसार- रुद्राक्ष धारण करने से बढ़कर श्रेष्ठ संसार में कोई वस्तु नहीं है। जो इंसान रुद्राक्ष को शरीर पर धारण करके उसकी पवित्रता का ध्यान रखता है, उसकी हर मनोकामना जरूर पूरी होती है।

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