वरिष्ठ पत्रकार प्रभु चावला मानते हैं कि 2019 के लाेकसभा चुनाव में भाजपाकी सीटें 282 से नीचे आ सकती है। सत्ता का लालच मायावती और अखिलेश को इकट्ठा कर देगा।

वरिष्ठ पत्रकार प्रभु चावला मानते हैं कि 2019 के लाेकसभा चुनाव में भाजपाकी सीटें 282 से नीचे आ सकती है। सत्ता का लालच मायावती और अखिलेश को इकट्ठा कर देगा। चुनावों के विभिन्न मुद्दों पर भास्कर के संतोष कुमार ने उनसे खास बातचीत की। पढ़िए मुख्य अंश :

सवाल:क्या 2019 में मोदी को हरा पाना मुश्किल है?
जवाब:
यह सवाल उठाते वक्त हम लोग इतिहास को ध्यान में नहीं रखते। राजीव गांधी के खिलाफ कोई विकल्प नहीं था। लेकिन 1989 में उन्हें 200 सीटें ही मिली और वे हार गए। नरसिंह राव जब हारे तो क्या उनके सामने कोई विकल्प था? 2004 में अटलजी के खिलाफ कौन था? ओपिनियन पोल में जनवरी 2004 में हमने छापा था कि एनडीए को 350 सीटें मिलेंगी और अप्रैल में 140 सीटें भी नहीं मिली। वो इसलिए हार गए, क्योंकि क्षेत्रीय पार्टियां उनके साथ खड़ी नहीं हुई। यह सच्चाई है कि मोदी के खिलाफ कोई पॉपुलर नेता विपक्ष के पास नहीं है। पर राज्य स्तर पर गठबंधन से मोदी हार सकते हैं। क्योंकि 2014 में मोदी की पॉपुलेरिटी के बावजूद वे राज्यों में ममता बनर्जी, नवीन पटनायक, जयललिता को नहीं हरा पाए। जहां कांग्रेस मजबूत थी वहां मोदी लहर चली। जहां कांग्रेस पार्टी नहीं थी वहां मोदी लहर नहीं चली। वही स्थिति आज भी है। भाजपा282 सीट से नीचे आ सकती है, इसमें दो राय नहीं है।

सवाल:यूपी में सपा-बसपा का गठबंधन हो पाएगा?
जवाब:
मायावती राजनीतिक रूप से लालची हैं। अखिलेश के लिए मौका है। अभी उनकी उम्र 46 के करीब है तो उन्हें लगता है कि मेरी कुछ कुर्बानी से मेरी साख बढ़ती है तो फायदा होगा। अखिलेश ने तय कर लिया है कि गठबंधन हर शर्त पर करूंगा। मायावती 40 सीट मांगेंगी तो भी देंगे। मुझे लगता है कि कांग्रेस से भी गठबंधन होगा। अखिलेश कांग्रेस को 2-4 सीटें दे सकते हैं। आखिरी मौके पर सीबीआई, ईडी का क्या असर होता है, कुछ नहीं कह सकते। मायावती डरती बहुत हैं और 15 साल से सत्ता से बाहर हैं तो उनका सत्ता में आना जरूरी है और अखिलेश के लिए भी। सत्ता का लालच दोनों को इकट्‌ठा करेगा। ममता, नवीन भी यही करेंगे, क्योंकि विरोधियों पर ही रेड हो रही है। गठबंधन नहीं भी हो तो भी भाजपा के लिए उस प्रदर्शन को दोहरा पाना संभव नहीं होगा।

सवाल: यूपी, एमपी, राजस्थान, गुजरात जैसे बड़े राज्यों से बीजेपी को उसकी कुल सीटों की 50% सीटेंमिली थीं। भाजपा यहां सीटें गंवाती है तो कहां से भरपाई होगी?
जवाब:
भाजपाको अन्नाद्रमुक से उम्मीद है। जगन रेड्‌डी, टीआरएस के साथ भी गठबंधन हो सकता है। यानी एक पूर्ति वो नए गठबंधन से करेंगे। पश्चिम बंगाल, ओडिशा और पूर्वोत्तर में भाजपा को कुछ उम्मीद है। इनकी निर्भरता- तमिलनाडु, आंध्रप्रदेश, प. बंगाल, ओडिशा पर ज्यादा है। पर मुझे लगता है कि इनकी पूर्ति कहीं से होने वाली नहीं है।

सवाल:आरोप हैं कि मोदी सरकार में सांप्रदायिकता और कट्‌टरता बढ़ी है?
जवाब:
देखिए, हिंदुस्तान का डीएनए एक सेकुलर देश का है। नारेबाजी या टीवी पर दिखाने से सांप्रदायिकता बढ़ गई, मैं इसे नहीं मानता। जो दो-चार-दस लोग हैं उन्हें भाजपा वाले प्रोत्साहित करते हैं ताकि लगे कि ध्रुवीकरण हो रहा है। मुझे नहीं लगता कि सांप्रदायिकता बढ़ी है। असहिष्णुता थोड़ी बढ़ी है भाषा के लिहाज से।

सवाल:चेहराविहीन विपक्ष मोदी का सामना कर पाएगा?
जवाब:
2004 में क्या हुआ था। भारतीय इतिहास बताता है कि जब भी चेहरा आया है उसके बाद बिना चेहरे के विपक्ष जीता है। चेहरा एक बार जीता है- वाजपेयी। करगिल नहीं होता तो वहां भी दिक्कत हो जाती। भारतीय राजनीति अजीब है, चेहरे को जिताती है और फिर बिना वैकल्पिक चेहरे के हराती भी है। 1977 से लेकर देखेंगे जब भी चेहरा जीता है चाहे इंदिरा गांधी हों, राजीव गांधी हों, वाजपेयी हों, वे हमेशा हारे हैं। जबकि उनके खिलाफ कोई बड़ी बातें नहीं थी।

सवाल:मोदी सरकार को पूर्ण बहुमत नहीं मिला तो विपक्ष से पीएम पद के लिए सबसे सक्षम व्यक्ति कौन है और क्यों?
जवाब:
जिसकी सबसे ज्यादा सीटें होंगी वो सबसे बड़ा दावेदार होगा। अगर उसकी स्वीकार्यता नहीं है तो दूसरी सबसे बड़ी पार्टी जो होगी उसका नेता होगा। प्रोसेस ऑफ एलिमिनेशन में जो ज्यादा स्वीकार्य चेहरा होगा वो पीएम होगा। कांग्रेस में राहुल ने कह दिया है कि वे रेस से बाहर नहीं है। अगर गठबंधन तय करेगा तो बनेंगे। सरप्राइज केंडीडेट भी हो सकता है, दोनों तरफ से।

सवाल:कांग्रेस के पास मोदी सरकार के खिलाफ क्या मुद्दे हैं?
जवाब:
मोदी भाजपा का ब्रांड हैं। कांग्रेस की रणनीति है कि ब्रांड की साख, विश्वसनीयता को तोड़ेंगे नहीं, तब तक वोट नहीं मिलने वाला। राहुल गांधी जहां भी जाते हैं वहां रफाल, अंबानी का मुद्दा उठाकर मोदी पर हमला बोलते हैं। जैसे राजीव गांधी पर इन लोगों ने सवाल उठाया था, तो राहुल गांधी अब उसका बदला ले रहे हैं। राहुल जहां भी जाते हैं वहां रफाल-रफाल, मोदी चोर कह रहे हैं। ये भाषा गलत है। दूसरा मुद्दा है किसान, जिसकी आमदनी दोगुनी करने का वादा है। सूट-बूट की सरकार का आरोप है। काला धन नहीं आया, बेरोजगारी, पेट्रोल-डीजल की बढ़ी कीमतों का मुद्दा भी है।

सवाल: और 2019में भाजपा क्या मुद्दा लेकर चुनाव में जाएगी?
जवाब:
देखिए, ये लोगों को बताएंगे कि जब से मोदी आए हैं आतंक कम हुआ है। पिछले साढ़े चार साल में कश्मीर के अलावा कोई भी आतंकी घटना नहीं हुई। नक्सलवाद भी कम हुआ, करप्शन नहीं हुआ, विदेश नीति सफल रही और इंफ्रास्ट्रक्चर में काम किया। महंगाई को नियंत्रित किया। उनका अहम नारा होगा कि हमारे पास एक ईमानदार नेता है।

सवाल:मोदी सरकार की दो बड़ी कामयाबी और दो असफलता बताइए?
जवाब:
सबसे बड़ी कामयाबी यह है कि सामाजिक सौहार्द्र है। कोई दंगा नहीं हुआ। दूसरा कि विदेश नीति में सफलता मिली। ट्रम्प का कोई भाषण भारत का नाम लिए बिना पूरा नहीं होता। तीसरा कि मजबूत नेता है। नाकामी इनकी है कि गरीबी कम नहीं हुई। कश्मीर का हल नहीं निकाल पाए।


सवाल:सरकार के आंकड़ों को विपक्ष झूठा बता रहा है। क्या वास्तव में देश में आंकड़ों की बाजीगरी चल रही है?
जवाब:
आंकड़ों की बाजीगरी तो जरूर चल रही है। जीडीपी का फॉर्मूला बदल दिया है। पांच करोड़ एलपीजी सिलेंडर बांट दिए, इससे कंपनी को तो फायदा मिला पर जिसे फ्री में दिया उसे दोबारा सिलेंडर भरवाना महंगा पड़ रहा है। एक रुपए वाला बीमा किसी को नहीं मिला, लेकिन बीमा कंपनी को फायदा हो गया। मोदीजी काम अच्छा करते हैं, लेकिन उसे अमल में कैसे लाना है उसके बारे में सोचते नहीं हैं।

सवाल:नोटबंदी,जीएसटी को आप कैसे देखते हैं। क्या ये सफल हैं?
जवाब:
नोटबंदी तो फेल हो गई। जो आइडिया था कि ब्लैक मनी खत्म होगी, कैश सर्कुलेशन कम होगा, आतंक कश्मीर में खत्म होगा, उन सबमें कुछ सफलता नहीं मिली। जीएसटी का अमल बेकार रहा।

सवाल:आजकल मीडिया बंटा हुआ है। या तो प्रो-मोदी या एंटी-मोदी। आपकी क्या राय है।
जवाब:
मीडिया नहीं बंटा हुआ है, पत्रकार बंटे हुए हैं। ज्यादातर पत्रकार या तो लिबरल हंै या प्रो मोदी हैं। पत्रकारों में कंपटीशन है कि हम चमचागिरी या कितनी चाटुकारिता कर सकते हैं। ये कंपटीशन मोदी की तरफ से नहीं है, मैं उनको 40 साल से जानता हूं। वे पॉजीटिव चाहते होंगे, लेकिन पत्रकारों में होड़ है। होड़ लगी है कि या तो मोदी के भक्त हैं या मोदी के खिलाफ हैं। पत्रकारिता का जो व्यावसायीकरण हुआ है और चाटुकारिता के लिए होड़ लगी है उसके लिए या तो मालिक जिम्मेदार हैं या पत्रकार, मोदी इसके लिए जिम्मेदार नहीं है।



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प्रभु चावला एडिटोरियल डायरेक्टर, द न्यू इंडियन एक्सप्रेस